लाला लाजपत राय का जीवन परिचय। | Lala Lajpat Rai Biography in Hindi

लाला लाजपत राय कौन थे?

लाला लाजपत राय, एक देशभक्त व्यक्ति थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया. लाला लाजपत राय एक लेखक, वकील, राजनीतिज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी थे. लाला जी को पंजाब केसरी के नाम से भी जाना जाता था. उन्होंने दयाल सिंह के साथ मिलकर 12 अप्रैल 1894 को भारत के दूसरे सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना की थी।

वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लाला जी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले नेताओं में से एक थे. इसीलिए इस लेख हम लाला लाजपत राय की जीवनी, उनके द्वारा किए गए कार्यों और उनके योगदान के बारे में जानेंगे।

लाला लाजपत राय का जीवन परिचय 

लाला लाजपत राय
लाला लाजपत राय
जन्म28 जनवरी 1865
उपनाम पंजाब केसरी
जन्म स्थानजगराओं, पंजाब, ब्रिटिश
भारत
मृत्यु17 नवंबर 1928
(63 वर्ष की आयु में)
मृत्यु स्थानलाहौर, पंजाब, ब्रिटिश भारत
जन्मदिन 28 जनवरी
शिक्षा गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल
धर्म हिंदू धर्म
राजनीतिक
गुरु
ज्यूसेपे मेत्सिनी
(Giuseppe Mazzini)
सदस्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,
आर्य समाज
आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन,
स्वदेशी आंदोलन
राजनीतिक
विचारधारा
राष्ट्रवाद और उदारवाद
राष्ट्रीयता भारतीय

लाला लाजपत राय का परिवार

पिता का नाममुंशी राधा कृष्ण अग्रवाल
माता का नामगुलाब देवी अग्रवाल
पत्नी का नामराधा देवी अग्रवाल
बच्चेअमृत राय अग्रवाल,
प्यारेलाल अग्रवाल और
एक बेटी पार्वती अग्रवाल

लाला लाजपत राय की जीवनी। | Lala Lajpat Rai Biography in Hindi

लाला लाजपत राय की कहानी

लाला लाजपत राय का प्रारंभिक जीवन

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को धुडिके में एक पंजाबी हिंदू परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम मुंशी राधा किशन अग्रवाल था, जो कि उर्दू और फ़ारसी के सरकारी शिक्षक थे, और उनकी माँ का नाम गुलाब देवी अग्रवाल था, जो की एक धार्मिक महिला थी।

उनका परिवार उनके जन्म के 5 साल बाद 1870 के अंत में रेवाड़ी चला गया, वहां लाला लाजपत राय की प्राथमिक शिक्षा सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय में हुई, जहाँ उनके पिता एक उर्दू शिक्षक के रूप में तैनात थे।

लाला लाजपत राय के प्रारंभिक जीवन के दौरान, उनके उदारवादी विचार, नैतिक मूल्य और हिंदू धर्म में मान्यताओं को उनके माता-पिता ने आकार दिया था।

लाला लाजपत राय के पिता चाहते थे कि उनका बेटा वकील बने, उस समय वकील बनना एक अच्छा करियर विकल्प था. इसीलिए 1880 में उन्होंने एक सरकारी कॉलेज में प्रवेश लिया, जो लाहौर में था. जहां उनकी मुलाकात भावी स्वतंत्रता सेनानी लाल हंस राज और पंडित गुरुदत्त से हुई।

लाहौर में कानून की पढ़ाई के दौरान लाला लाजपत राय हिंदू सुधारवादी स्वामी दयानंद सरस्वती से काफी प्रभावित थे, इसलिए वे आर्य समाज में शामिल हो गए और आर्य गजट के संस्थापक और संपादक बन गए।

1884 में उनके पिता का तबादला रोहतक में हुआ, लाला लाजपत राय ने भी कानून की पढ़ाई पूरी की और अपने पिता के साथ रोहतक आ गए. दो साल बाद, लाला जी कानून का अभ्यास करने के लिए 1886 में हिसार चले गए।

लाला लाजपत राय जी की राजनीतिक यात्रा

लाला लाजपत राय का बचपन का सपना था, कि वह अपने देश के लिए काम करें और उन्होंने अपने देश को बाहरी ताकतों से मुक्त करने का संकल्प लिया था. इसलिए 1886 में लाला लाजपत राय जी ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर हिसार जिले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की एक शाखा की स्थापना की।

1888 और 1889 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए चार प्रतिनिधियों ने हिसार से इलाहाबाद की यात्रा की. लाला लाजपत राय बाबू चूड़ामणि, लाला छबील दास और सेठ गौरी शंकर के साथ कांग्रेस की बैठक में शामिल हुए।

1892 में, लाला जी फिर लाहौर उच्च न्यायालय के समक्ष वकालत करने के लिए लाहौर आए. उन्होंने अपनी बात लोगों तक पहुंचने के लिए पत्रकारिता का अभ्यास भी किया. उन्होंने द ट्रिब्यून समेत कई अखबारों में लेख लिखे।

1914 में, लाला लाजपत राय जी ने कानून का अभ्यास छोड़ दिया और देश को ब्रिटिश शासन से पूरी तरह से मुक्त कराने के लिए खुद को समर्पित कर दिया. 1914 में लाला लाजपत राय ब्रिटेन भी गए।

1917 में, लाला लाजपत राय जी अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गए. अमेरिका में रहते हुए, उन्होंने न्यूयॉर्क में इंडियन होम रूल लीग, एक मासिक पत्रिका यंग इंडिया और हिंदुस्तान सूचना सेवा संघ की स्थापना की।

लाला जी ने अमेरिका की विदेश मामलों की समिति में 32 पन्नों की याचिका दायर की. जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों और लोगों के अधिकारों की बात की और उनसे नैतिक समर्थन भी मांगा. अक्टूबर 1917 में सीनेट में इस याचिका पर चर्चा हुई. लाला लाजपत राय 1917 से 1919 तक यूएसए में रहे।

1919 में, लाला लाजपत राय भारत वापस आए और कांग्रेस के विशेष सत्र का हिस्सा बने, जिसमें असहयोग आंदोलन शुरू करने की बात कही गई।

1920 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया. जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद, उन्होंने अंग्रेजों की क्रूर कार्रवाई के खिलाफ पंजाब में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

1920 में महात्मा गांधी जी ने असहयोग आंदोलन की शुरूआत की, इस आंदोलन का नेतृत्व पंजाब में लाला लाजपत राय जी ने किया था. 1921 से 1923 के बीच लाला जी को जेल में डाल दिया गया।

चौरा-चौरी कांड के बाद महात्मा गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. लेकिन लाला लाजपत राय जी ने इस निर्णय विरोध किया।

नवंबर 1927 में, ब्रिटिश रूढ़िवादी सरकार द्वारा भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा स्थापित भारतीय संविधान के कामकाज पर रिपोर्ट करने के लिए साइमन कमीशन की स्थापना की गई थी।

इस आयोग में 7 सदस्य थे, इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे. इसमें कोई भारतीय प्रतिनिधि नहीं था. इसलिए पूरे देश में विरोध शुरू हो गया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया।

30 अक्टूबर, 1928 को जब आयोग भारत आया, तो विरोध शुरू हो गया; लाला लाजपत राय विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे, साइमन गो बैक के नारे लगा रहे थे और काले झंडे लहराए गए थे, यह एक शांतिपूर्ण विरोध था।

विरोध के दौरान पुलिस अधीक्षक, जेम्स ए. स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया. जिससे लाला लाजपत राय बहुत घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने लोगों को संबोधित किया और कहा: “मैं घोषणा करता हूं कि आज मुझ पर हमला भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत में आखिरी कील होगा.” ( In English – “I declare that the attack on me today will be the last nail in the coffin of British rule in India”.)

मृत्यु

17 नवंबर 1928 को गंभीर रूप से घायल होने के कारण लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई. यह देखकर भगत सिंह बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने राजगुरुसुखदेव और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर जेम्स ए स्कॉट को मारने की योजना बनाई. लेकिन उन्होंने गलती से जेम्स ए स्कॉट की जगह जेपी सॉन्डर्स को मार डाला।

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